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mahabharat 2.64.4: पासों का हृदय मेरे धनुष की डोरी है और जहाँ से पासे फेंके जाते हैं, वह स्थान मेरा रथ है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 2.64: धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 64: धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.64.4 
अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
पासों का हृदय मेरे धनुष की डोरी है और जहाँ से पासे फेंके जाते हैं, वह स्थान मेरा रथ है ॥4॥
 
The heart of the dice is the string of my bow and the place from where the dice are thrown is my chariot. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)