श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.63.5 
राजन् परिणतप्रज्ञो वृद्धसेवी जितेन्द्रिय:।
प्रतिपन्नान् स्वकार्येषु सम्मोहयसि नो भृशम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
राजा! आपकी बुद्धि परिपक्व है, आप वृद्धजनों की सेवा करते रहते हैं, आपने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, फिर भी जब हम अपने-अपने कामों में लगे रहते हैं, तब आप हमें बार-बार प्रलोभन देते हैं॥5॥
 
King! Your intellect is mature, you keep serving the elderly people, you have conquered your senses, yet when we are busy in our work, you repeatedly tempt us. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)