श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.63.21 
एतादृशस्य किं मेऽद्य जीवितेन विशाम्पते।
वर्धन्ते पाण्डवा नित्यं वयं त्वस्थिरवृद्धय:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! आज मैं जिस स्थिति में हूँ, उसमें रहने से क्या लाभ? पाण्डव दिन-प्रतिदिन उन्नति कर रहे हैं और हमारी उन्नति (प्रगति) अस्थिर है - वह अधिक समय तक टिकने वाली नहीं लगती।
 
Maharaj! What is the use of my living in the condition I am in today? The Pandavas are progressing day by day and our growth (progress) is unstable- it does not seem to last for long.
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)