श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.63.18 
आजमीढ रिपोर्लक्ष्मीर्मा ते रोचिष्ट भारत।
एष भार: सत्त्ववतां नय: शिरसि विष्ठित:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी रत्न! अजामिधानन्दन! शत्रु का धन तुम्हें प्रिय नहीं होना चाहिए। न्याय को सदैव अपने सिर पर रखना भी बुद्धिमानों के लिए भार है॥18॥
 
O jewel of Bharat's clan! Ajamidhanandan! You should not like the wealth of your enemy. Keeping justice on one's head all the time is also a burden for the wise.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)