श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.63.15 
नास्ति वै जातित: शत्रु: पुरुषस्य विशाम्पते।
येन साधारणी वृत्ति: स शत्रुर्नेतरो जन:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
नरेश्वर! मनुष्य का जन्म से कोई शत्रु नहीं होता, जिसके साथ उसकी आजीविका एक ही हो, अर्थात् जो लोग एक ही व्यवसाय से जीविका चलाते हैं, वे ही (ईर्ष्या के कारण) एक-दूसरे के शत्रु होते हैं, दूसरे नहीं॥15॥
 
Nareshwar! Man does not have any enemy by birth, with whom he has the same livelihood, that is, the people who earn their living from the same profession, they are the enemies of each other (due to jealousy), not others. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)