शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका।
यो वै संतापयति यं स शत्रु: प्रोच्यते नृप॥ १०॥
अनुवाद
हे राजन! अमुक शत्रु और अमुक मित्र का कोई उल्लेख नहीं है, न ही मित्र और शत्रु का बोध कराने वाला कोई शब्द है। जो किसी को कष्ट देता है, वह उसका शत्रु कहलाता है॥ 10॥
O King! There is no record of such and such an enemy and such and such a friend, nor is there any word denoting friend and enemy. Whoever troubles someone is called his enemy.॥ 10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥