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mahabharat 2.61.26: हे वीर कुरुप! इस विषय में गहन विचार करने पर भी मुझे शांति नहीं मिलती। इसी कारण मैं दुर्बल, मंद और शोक से युक्त हो रहा हूँ॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 2.61: दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.61.26 
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म
समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर।
तेनाहमेवं कृशतां गतश्च
विवर्णतां चैव सशोकतां च॥ २६॥
 
 
अनुवाद
हे वीर कुरुप! इस विषय में गहन विचार करने पर भी मुझे शांति नहीं मिलती। इसी कारण मैं दुर्बल, मंद और शोक से युक्त हो रहा हूँ॥ 26॥
 
O brave Kurupra! Even after thinking deeply about this, I do not get peace. This is why I am becoming weak, dull and filled with sorrow.॥ 26॥
 
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)