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mahabharat 2.6.5-6: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर ने नारदजी के पूर्वोक्त कथन की बहुत प्रशंसा की। फिर जब समस्त लोकों में विचरण करने वाले नारद मुनि शांत भाव से बैठ गए, तब दो घड़ी के पश्चात उचित समय जानकर महाबली पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके पास आकर बैठ गए और वहाँ समस्त राजाओं के बीच में उनसे इस प्रकार पूछने लगे।   |   mahabharat अध्याय 2.6: युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 6: युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  2.6.5-6 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक्यं तदभिपूज्य च।
मुहूर्तात् प्राप्तकालं च दृष्ट्वा लोकचरं मुनिम्॥ ५॥
नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिर:।
अपृच्छत् पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युति:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर ने नारदजी के पूर्वोक्त कथन की बहुत प्रशंसा की। फिर जब समस्त लोकों में विचरण करने वाले नारद मुनि शांत भाव से बैठ गए, तब दो घड़ी के पश्चात उचित समय जानकर महाबली पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके पास आकर बैठ गए और वहाँ समस्त राजाओं के बीच में उनसे इस प्रकार पूछने लगे।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Having said this, the righteous Yudhishthira greatly praised the aforesaid discourse of Naradji. Then when the sage Narad, who roams in all the worlds, sat down peacefully, then after two hours, knowing the right time, the mighty son of Pandu, king Yudhishthira also came and sat near him and started asking him in this manner there in the midst of all the kings. 5-6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)