श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 59: युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  2.59.2 
नाविदं मूढमात्मानं दृष्ट्वाहं तदरेर्धनम्।
फलतो भूमितो वापि प्रतिपद्यस्व भारत॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे यशस्वी भरत! विश्वास करो, शत्रुओं का वैभव देखकर मेरा मन मोहित हो गया। मैं यह नहीं जान सका कि वहाँ कितना धन है और वह किस देश से आया है॥ 2॥
 
O illustrious Bharata! Believe me, seeing the splendour of the enemies my mind became bewildered. I could not know how much wealth there was and from which country it was brought.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)