श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना  »  श्लोक 9-11
 
 
श्लोक  2.58.9-11 
देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते।
यत् प्राह शास्त्रं भगवान् बृहस्पतिरुदारधी:।
तद् वेद विदुर: सर्वं सरहस्यं महाकवि:॥ ९॥
स्थितस्तु वचने तस्य सदाहमपि पुत्रक।
विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मत:॥ १०॥
उद्धवो वा महाबुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप।
तदलं पुत्र द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'महाज्ञानी विदुर उन समस्त शास्त्रों को उनके रहस्यों सहित जानते हैं, जिनका उपदेश उदारचित्त इन्द्रगुरु भगवान बृहस्पति ने परम बुद्धिमान देवराज इन्द्र को दिया था। बेटा! मैं भी विदुर की बात से सदैव सहमत हूँ। विदुर कुरुकुल में श्रेष्ठ और सबसे बुद्धिमान माने जाते हैं और वृष्णिवंश में पूजित उद्धव सबसे बुद्धिमान माने जाते हैं। अतः बेटा! जुए से कोई लाभ नहीं है। जु में वैर-विरोध की संभावना रहती है। 9-11॥
 
'The great wise Vidur knows all the scriptures along with its secrets which were preached by Lord Brihaspati, the generous minded Indraguru, to the most intelligent Devraj Indra. Son! I also always agree with Vidur. Vidur is considered to be the best and most intelligent among the Kurukula and Uddhava, worshiped in the Vrishni dynasty, is considered to be the most intelligent. So son! There is no benefit in gambling. There is a possibility of antagonism in Ju. 9-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)