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mahabharat 2.58.32: महाराज! मुझे एक और कष्ट सहना पड़ा, जो मैं आपसे कहता हूँ, सुनिए। एक स्थान पर एक द्वारनुमा संरचना थी, जिसमें कोई द्वार नहीं था। मैं उसमें से निकलने का प्रयत्न कर रहा था, तभी एक चट्टान से टकरा गया। जिससे मेरे माथे पर गहरी चोट लग गई। 32।   |   mahabharat अध्याय 2.58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.58.32 
प्रलम्भं च शृणुष्वान्यद् वदतो मे नराधिप।
अद्वारेण विनिर्गच्छन् द्वारसंस्थानरूपिणा।
अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षत:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मुझे एक और कष्ट सहना पड़ा, जो मैं आपसे कहता हूँ, सुनिए। एक स्थान पर एक द्वारनुमा संरचना थी, जिसमें कोई द्वार नहीं था। मैं उसमें से निकलने का प्रयत्न कर रहा था, तभी एक चट्टान से टकरा गया। जिससे मेरे माथे पर गहरी चोट लग गई। 32।
 
Maharaj! I had to suffer another deprivation, which I will tell you, listen. At one place, there was a door-like structure without any door, I tried to come out from that; hence I collided with a rock. Due to which, I got a severe injury on my forehead. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)