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mahabharat 2.58.29: हे मनुष्यों के स्वामी! जब मैंने पुनः वैसा ही कुआँ देखा, जो कमलों से सुशोभित था, तब मैंने सोचा कि प्रथम पुष्करिणी की भाँति यह भी स्फटिकमणियों से भरकर समतल कर दी गई होगी; किन्तु वास्तव में यह जल से भरा हुआ था, इसीलिए मैं भूल से इसमें गिर पड़ा।   |   mahabharat अध्याय 2.58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.58.29 
पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम्।
मत्वा शिलासमां तोये पतितोऽस्मि नराधिप॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जब मैंने पुनः वैसा ही कुआँ देखा, जो कमलों से सुशोभित था, तब मैंने सोचा कि प्रथम पुष्करिणी की भाँति यह भी स्फटिकमणियों से भरकर समतल कर दी गई होगी; किन्तु वास्तव में यह जल से भरा हुआ था, इसीलिए मैं भूल से इसमें गिर पड़ा।
 
O Lord of men! When I saw a similar well again, which was decorated with lotuses, I thought that like the first Pushkarini, this too must have been filled with crystal stones and levelled; but in reality, it was full of water, that is why I fell into it by mistake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)