श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 58: दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दु:ख और चिन्ताका कारण बताना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.58.24 
न मे हस्त: समभवद् वसु तत् प्रतिगृह्णत:।
अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जब मेरे हाथ उन रत्नों के ढेरों को इकट्ठा करते-करते थक गए, तब थकने पर मुझे दूर-दूर तक रत्नों के ढेरों के साथ खड़े राजा दिखाई देने लगे।
 
When my hands got tired of collecting those piles of gems, then upon my getting tired I could see kings standing far away with those piles of gems. 24.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)