श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक d5
 
 
श्लोक  2.57.d5 
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मन्द: क्रोधवशानुग:।
पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन्॥)
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: अपने पिता की यह बात सुनकर मूर्ख दुर्योधन ने क्रोध में भरकर उन्हें अपने विचार बताये और इस प्रकार उत्तर दिया।
 
Vaishmpayana says: On hearing this statement of his father, the foolish Duryodhan, overcome with anger, told him his thoughts and replied in this manner.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas