श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  2.57.d2 
निरुक्तं निगमं छन्द: सषडङ्गार्थशास्त्रवान्।
अधीत: कृतविद्यस्त्वमष्टव्याकरणै: कृपात्॥
 
 
अनुवाद
आपने कृपाचार्य से निरुक्त, निगम, छंद, वेद के छह अंग, अर्थशास्त्र तथा आठ प्रकार के व्याकरण का अध्ययन किया है।
 
You have studied Nirukta, Nigaam, Chhanda, six parts of Veda, Arthashastra and eight types of grammar from Kripacharya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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