श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  2.57.d1 
(उपस्थित: सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा।
विविधैरन्नपानैश्च प्रवरै: किं नु शोचसि॥
 
 
अनुवाद
जैसे स्वर्ग में इन्द्र को सभी इच्छित भोग उपलब्ध हैं, वैसे ही तुम्हें भी सभी इच्छित भोग तथा खाने-पीने की नाना प्रकार की स्वादिष्ट वस्तुएँ सदैव उपलब्ध हैं। फिर तुम शोक क्यों करते हो?
 
Just as all the desired pleasures are available to Indra in heaven, similarly all the desired pleasures and various delicious things to eat and drink are always available to you. Then why do you grieve?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas