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श्लोक 2.57.60  |
इत्युक्तो विदुरो धीमान् नेदमस्तीति चिन्तयन्।
आपगेयं महाप्राज्ञमभ्यगच्छत् सुदु:खित:॥ ६०॥ |
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| अनुवाद |
| धृतराष्ट्र की यह बात सुनकर बुद्धिमान विदुरजी यह सोचकर कि यह पासों का खेल अच्छा नहीं है, अत्यन्त दुःखी हुए और गंगापुत्र बुद्धिमान भीष्मजी के पास गए। |
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| On hearing Dhritarashtra say this, the wise Vidurji, thinking that this game of dice is not good, became very sad and went to the wise Bhishmaji, the son of Ganga. |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४९॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं) |
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