श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.57.49 
तत: संस्तीर्य रत्नैस्तां तक्ष्ण आनाय्य सर्वश:।
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदयत मे शनै:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
फिर सब देशों से बढ़इयों को बुलाकर सभाभवन के स्तम्भों और दीवारों में रत्न जड़वाओ। जब यह सुन्दर और सुसज्जित सभाभवन प्रवेश के योग्य हो जाए, तब चुपचाप मेरे पास आकर मुझे इसकी सूचना दो।॥49॥
 
‘Then call carpenters from all countries and get gems embedded in the pillars and walls of the assembly hall. When this beautiful and decorated assembly hall becomes comfortable for entry, then quietly come to me and inform me about it.'॥ 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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