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श्लोक 2.57.48  |
स्थूणासहस्रैर्बृहतीं शतद्वारां सभां मम।
मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तु शिल्पिन:॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| बहुत से कारीगरों को नियुक्त करके शीघ्र ही एक सुन्दर एवं विशाल सभाभवन बनवाओ, जिसमें सौ द्वार और एक हजार स्तम्भ हों॥48॥ |
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| ‘Employ many craftsmen and quickly construct a very beautiful and huge assembly hall. It should have a hundred doors and a thousand pillars.॥ 48॥ |
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