श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.57.48 
स्थूणासहस्रैर्बृहतीं शतद्वारां सभां मम।
मनोरमां दर्शनीयामाशु कुर्वन्तु शिल्पिन:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
बहुत से कारीगरों को नियुक्त करके शीघ्र ही एक सुन्दर एवं विशाल सभाभवन बनवाओ, जिसमें सौ द्वार और एक हजार स्तम्भ हों॥48॥
 
‘Employ many craftsmen and quickly construct a very beautiful and huge assembly hall. It should have a hundred doors and a thousand pillars.॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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