श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.57.47 
वैशम्पायन उवाच
आर्तवाक्यं तु तत् तस्य प्रणयोक्तं निशम्य स:।
धृतराष्ट्रोऽब्रवीत् प्रेष्यान् दुर्योधनमते स्थित:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपने पुत्र के इन प्रेमपूर्ण तथा व्यथित वचनों को सुनकर राजा धृतराष्ट्र दुर्योधन की बात मानकर अपने सेवकों से इस प्रकार बोले -॥47॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing these loving and distressed words of his son, King Dhritarashtra came in the opinion of Duryodhan and spoke to his servants thus:॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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