श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.57.44 
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम्।
उभयो: पक्षयोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चयम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
विदुर दूरदर्शी हैं। वे दोनों पक्षों के हित और उचित बात का विचार करके धर्मानुसार कार्य करने का निश्चय करते हैं ॥ 44॥
 
Vidur is far-sighted. He will think of what is right and in the best interest of both parties and then decide on a course of action in accordance with Dharma. ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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