श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  2.57.41-42 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: शकुनिना राजा दुर्योधनस्तत:।
धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत्॥ ४१॥
अयमुत्सहते राजञ्छ्रियमाहर्तुमक्षवित्।
द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! शकुनि की यह बात सुनकर राजा दुर्योधन ने तुरन्त धृतराष्ट्र से कहा - 'हे राजन! वह अक्ष विद्या का रहस्य जानता है और जुए के द्वारा पाण्डवपुत्र युधिष्ठिर के राज-धन का अपहरण करने के लिए आतुर है; अतः उसे इसकी अनुमति दीजिए।'
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing Shakuni say this, king Duryodhan immediately said to Dhritarashtra - 'O King! He knows the secret of Aksha Vidya and is eager to kidnap the royal wealth of Pandava's son Yudhishthira through gambling; therefore give him permission for this.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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