श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.57.4 
शकुनिरुवाच
दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिण: कृश:।
दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप॥ ४॥
 
 
अनुवाद
शकुनि ने कहा- महाराज! दुर्योधन का तेज क्षीण हो रहा है! वह पीला और दुर्बल हो गया है। उसकी दशा अत्यंत दयनीय है। वह निरंतर चिंता में डूबा रहता है। हे नरदेव! कृपया उसकी भावनाओं को समझें।
 
Shakuni said— Maharaj! Duryodhan's radiance is fading! He has become pale and weak. His condition is very pitiable. He is constantly immersed in worry. O lord of men! Please understand his feelings.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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