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mahabharat 2.57.38: भरत! मैं इस संसार में जुआ खेलने की कला में निपुण हूँ, मैं जुआ खेलने का सार जानता हूँ; मैं दांव लगाना भी जानता हूँ और मैं पासे फेंकने की कला में भी निपुण हूँ।   |   mahabharat अध्याय 2.57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.57.38 
अहमक्षेष्वभिज्ञात: पृथिव्यामपि भारत।
हृदयज्ञ: पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
भरत! मैं इस संसार में जुआ खेलने की कला में निपुण हूँ, मैं जुआ खेलने का सार जानता हूँ; मैं दांव लगाना भी जानता हूँ और मैं पासे फेंकने की कला में भी निपुण हूँ।
 
Bharata! I am an expert in the art of gambling in this world, I know the essence of gambling; I also know how to place bets and I am also an expert in the art of throwing dice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)