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श्लोक 2.57.37  |
शकुनिरुवाच
यामेतामतुलां लक्ष्मीं दृष्टवानसि पाण्डवे।
तस्या: प्राप्तावुपायं मे शृणु सत्यपराक्रम॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| शकुनि ने दुर्योधन से पुनः कहा- हे वीर दुर्योधन! पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के यहाँ तुमने जो अद्वितीय लक्ष्मी देखी है, उसे पाने का उपाय मुझसे सुनो॥37॥ |
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| Shakuni again said to Duryodhan – True brave Duryodhan! Hear from me the solution to attain the unique Lakshmi that you have seen at the place of Pandu's son Yudhishthir. 37॥ |
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