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mahabharat 2.57.36: पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर की उस उत्तम लक्ष्मी को देखकर मेरा हृदय ईर्ष्यालु हो गया है; इसलिए मुझे क्षण भर भी शांति नहीं मिलती ॥36॥   |   mahabharat अध्याय 2.57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.57.36 
तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम्।
शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर की उस उत्तम लक्ष्मी को देखकर मेरा हृदय ईर्ष्यालु हो गया है; इसलिए मुझे क्षण भर भी शांति नहीं मिलती ॥36॥
 
Seeing that excellent Lakshmi of Pandu's son Yudhishthira, my heart has become jealous; Therefore I do not get peace even for a moment. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)