श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.57.34 
सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर।
यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमत:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जनेश्वर! बुद्धिमान पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के उस यज्ञ में भूपालगण समस्त रत्नों की भेंट लेकर आये थे। 34॥
 
Janeshwar! In that yajna of wise Pandunandan Yudhishthir, Bhupalgan had brought gifts of all the gems. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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