|
| |
| |
श्लोक 2.57.32  |
मुहुर्मुहु: प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत।
अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन्॥ ३२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे भारत! वहाँ बार-बार ऐसा ही शंख बजता था और मैं निरंतर उसकी ध्वनि सुनता था; उससे मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न होता था। |
| |
| O Bharata! Such a conch was blown there again and again and I used to hear the sound of the conch incessantly; it used to send thrills through my body. |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|