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mahabharat 2.57.32: हे भारत! वहाँ बार-बार ऐसा ही शंख बजता था और मैं निरंतर उसकी ध्वनि सुनता था; उससे मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न होता था।   |   mahabharat अध्याय 2.57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.57.32 
मुहुर्मुहु: प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत।
अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे भारत! वहाँ बार-बार ऐसा ही शंख बजता था और मैं निरंतर उसकी ध्वनि सुनता था; उससे मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न होता था।
 
O Bharata! Such a conch was blown there again and again and I used to hear the sound of the conch incessantly; it used to send thrills through my body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)