श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.57.30 
इदं चाद्‍भुतमत्रासीत् तन्मे निगदत: शृणु॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में एक और आश्चर्य की बात हुई, वह मैं तुमसे कहता हूँ; सुनो ॥30॥
 
Another astonishing thing happened during the Rajasuya Yajna of Yudhishthira, I shall tell you about it; listen. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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