श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.57.26 
यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रिय:।
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधि:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जैसे देवराज इन्द्र के लिए मधु को घड़ों में भरकर रखते हैं, वैसे ही समुद्र ने वरुणदेव द्वारा दिया हुआ मधु एक कांसे के पात्र में रखकर युधिष्ठिर के पास भेजा था॥ 26॥
 
Just as the celestial nymphs keep honey in pitchers for Indra, similarly, the ocean had sent honey given by the god Varuna, kept in a bronze vessel, as a gift to Yudhishthira.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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