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mahabharat 2.57.24: ब्राह्मण और वैश्य, जो हरी-भरी फसलें उगाकर अपनी जीविका चलाते थे और जिनके पास बहुत से मवेशी थे, सैकड़ों समूहों में इकट्ठे हुए थे और तीन खर्व उपहारों के साथ राजा के दरवाजे पर खड़े थे।   |   mahabharat अध्याय 2.57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.57.24 
ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्त: शतसङ्घश:।
त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण और वैश्य, जो हरी-भरी फसलें उगाकर अपनी जीविका चलाते थे और जिनके पास बहुत से मवेशी थे, सैकड़ों समूहों में इकट्ठे हुए थे और तीन खर्व उपहारों के साथ राजा के दरवाजे पर खड़े थे।
 
The Brahmins and the Vaishyas, who made their living by growing lush green crops and who owned many cattle, had assembled in hundreds of groups and were standing at the king's doorstep with three Kharva gifts.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)