श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.57.23 
अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप।
शमं नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! शत्रु के अपार धन को देखकर मैं चिन्तित हूँ; मुझे शान्ति नहीं मिल रही है।
 
Maharaj! I am worried seeing the infinite wealth of the enemy; I cannot find peace. 23.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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