श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.57.22 
न क्वचिद्धि मया तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुत:।
यादृग् धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमत:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के यज्ञ से प्राप्त हुआ ऐसा धन मैंने न तो देखा है और न सुना है ॥22॥
 
I have neither seen nor heard of such wealth as was obtained in the yajna performed by the intelligent son of Pandu, Yudhishthira. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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