श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  2.57.16-17h 
सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीयमानं निशम्य च।
अदृश्यामपि कौन्तेयश्रियं पश्यन्निवोद्यताम्॥ १६॥
तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिण: कृश:।
 
 
अनुवाद
शत्रुओं की वृद्धि देखकर, अपनी दीनता देखकर तथा युधिष्ठिर की अदृश्य लक्ष्मी को प्रत्यक्ष देखकर मैं चिन्ताग्रस्त हो गया हूँ। इसी कारण मेरी कान्ति क्षीण हो गई है और मैं दीन, दुर्बल और श्वेत हो गया हूँ ॥16 1/2॥
 
Seeing the increase in enemies and myself going into a miserable state and seeing Yudhishthira's invisible goddess Lakshmi as if she were visible, I have become worried. This is the reason why my radiance has faded and I have become miserable, weak and white. ॥16 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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