श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.57.15 
न मां प्रीणाति मद्‍भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे।
अति ज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, उस तेजस्वी राजदेवी लक्ष्मी को देखकर मुझे भोजन करना अच्छा नहीं लगता। वही मेरी कांति का नाश कर रही है॥15॥
 
Seeing that radiant royal goddess Lakshmi, son of Kunti Yudhishthira, I do not like to eat. She is the one who is destroying my radiance. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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