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श्लोक 2.57.15  |
न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे।
अति ज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, उस तेजस्वी राजदेवी लक्ष्मी को देखकर मुझे भोजन करना अच्छा नहीं लगता। वही मेरी कांति का नाश कर रही है॥15॥ |
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| Seeing that radiant royal goddess Lakshmi, son of Kunti Yudhishthira, I do not like to eat. She is the one who is destroying my radiance. ॥ 15॥ |
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