श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 57: धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.57.13 
अमर्षण: स्वा: प्रकृतीरभिभूय परं स्थित:।
क्लेशान् मुमुक्षु: परजान् स वै पुरुष उच्यते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जो अपने शत्रुओं के प्रति क्रोध करके तथा उन्हें परास्त करके विश्राम करता है तथा शत्रुओं द्वारा उत्पन्न कष्टों से अपनी प्रजा को मुक्त करने की इच्छा रखता है, उसे पुरुष कहते हैं।
 
He who, having felt resentment towards his enemies and having defeated them, takes rest and desires to free his subjects from the troubles caused by the enemies, is called a man. 13.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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