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श्लोक 2.56.23  |
दुर्योधन उवाच
त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौबल।
निवेदय यथान्यायं नाहं शक्ष्ये निवेदितुम्॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| दुर्योधन ने कहा- सुबलनन्द! तुम ये सब बातें कुरुवंश के प्रधान महाराज धृतराष्ट्र से विधिपूर्वक कहो। मैं स्वयं कुछ नहीं कह सकूँगा॥23॥ |
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| Duryodhan said- Subalananda! You tell all these things in a proper manner to Maharaja Dhritarashtra, the head of the Kuru clan. I myself will not be able to say anything.॥ 23॥ |
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे अष्टचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं) |
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