Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 2.55.39: उन राजसी लक्ष्मी को, उस दिव्य सभा को और रक्षकों द्वारा किए गए मेरे उपहास को देखकर मैं निरंतर पीड़ा में रहता हूँ, मानो अग्नि में जल रहा हूँ ॥39॥ | mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना । mahabharat पर्व 2: सभा पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सोऽहं श्रियं च तां दृष्ट्वा सभां तां च तथाविधाम्।
रक्षिभिश्चावहासं तं परितप्ये यथाग्निना॥ ३९॥
अनुवाद
उन राजसी लक्ष्मी को, उस दिव्य सभा को और रक्षकों द्वारा किए गए मेरे उपहास को देखकर मैं निरंतर पीड़ा में रहता हूँ, मानो अग्नि में जल रहा हूँ ॥39॥
Beholding that Royal Goddess Lakshmi, that celestial assembly and the mockery made of me by the guards, I become constantly tormented, as if I were burning in fire. ॥ 39॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥