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श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.55.37 
कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल।
तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे सुबलपुत्र! मैंने पहले भी धर्मराज युधिष्ठिर को नष्ट करने का प्रयत्न किया था, किन्तु उन सब कठिनाइयों को पार करके वे जल में कमल के समान बढ़ते रहे।
 
O son of Subala, I had earlier tried to destroy Yudhishthira, the king of Dharma, but overcoming all those difficulties, he continued to grow like a lotus in water.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)