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mahabharat 2.55.36: उस अक्षय, शुद्ध लक्ष्मी का संचय कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के पास देखकर मैं भाग्य को ही सबसे प्रबल मानता हूँ; प्रयत्न व्यर्थ जान पड़ता है ॥36॥   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.55.36 
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम्।
दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
उस अक्षय, शुद्ध लक्ष्मी का संचय कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के पास देखकर मैं भाग्य को ही सबसे प्रबल मानता हूँ; प्रयत्न व्यर्थ जान पड़ता है ॥36॥
 
Seeing the accumulation of that inexhaustible, pure Lakshmi with Yudhishthir, son of Kunti, I consider destiny to be the strongest; efforts seem to be futile. ॥ 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)