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श्लोक 2.55.35  |
अशक्तश्चैक एवाहं तामाहर्तुं नृपश्रियम्।
सहायांश्च न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये॥ ३५॥ |
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| अनुवाद |
| मैं अकेला ही उन राजदेवी लक्ष्मी को प्राप्त करने में असमर्थ हूँ और मुझे अपने समीप कोई योग्य सहायक नहीं मिलता; इसीलिए मैं मृत्यु का विचार कर रहा हूँ ॥35॥ |
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| I alone am incapable of seizing that royal goddess Lakshmi and I do not find any capable helper near me; that is why I contemplate death. ॥ 35॥ |
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