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mahabharat 2.55.33: इस समय मैं न तो स्त्री हूँ, न शस्त्रधारी, न पुरुष हूँ, न नपुंसक हूँ, फिर भी शत्रुओं के पास आया हुआ ऐसा उत्तम धन देखकर भी मैं चुपचाप उसे सहन कर रहा हूँ ॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.55.33 
सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि।
योऽहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इस समय मैं न तो स्त्री हूँ, न शस्त्रधारी, न पुरुष हूँ, न नपुंसक हूँ, फिर भी शत्रुओं के पास आया हुआ ऐसा उत्तम धन देखकर भी मैं चुपचाप उसे सहन कर रहा हूँ ॥ 33॥
 
At this moment I am neither a woman nor armed, nor a man nor impotent, yet despite seeing such excellent wealth that has come to my enemies, I am quietly enduring it. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)