श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.55.32 
को हि नाम पुमाँल्लोके मर्षयिष्यति सत्त्ववान्।
सपत्नानृद्धॺतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
संसार में ऐसा बलवान पुरुष कौन होगा, जो शत्रुओं की वृद्धि और अपनी दयनीय स्थिति को चुपचाप सहन कर लेगा? ॥32॥
 
Who will be such a powerful man in the world, who will silently endure the increase of enemies and his own miserable condition? ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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