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श्लोक 2.55.31  |
वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम्।
अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम्॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| मैं या तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा या जल में डूब मरूँगा; अब और जीवित नहीं रह सकूँगा ॥31॥ |
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| I will either enter the fire, consume poison or drown myself in water; I will not be able to survive anymore. ॥ 31॥ |
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