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mahabharat 2.55.29: पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के पास तेजस्वी लक्ष्मी को देखकर मैं ईर्ष्या से जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुर्दशा उचित नहीं है ॥29॥   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.55.29 
श्रियं तथाऽऽगतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे।
अमर्षवशमापन्नो दह्यामि न तथोचित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के पास तेजस्वी लक्ष्मी को देखकर मैं ईर्ष्या से जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुर्दशा उचित नहीं है ॥29॥
 
I am burning with jealousy seeing the radiant goddess Lakshmi present near Yudhishthira, son of Pandu. Although my plight is not justified. ॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)