श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.55.28 
तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम्।
उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदा:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जैसे कर देनेवाले व्यापारी और वैश्य नाना प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर राजा के पास आते हैं, वैसे ही सब राजा नाना प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर राजा युधिष्ठिर के पास आते हैं॥ 28॥
 
Just as the tax-paying merchants and Vaishyas present themselves to the king with gifts of various kinds of precious stones, similarly all the kings presented themselves to King Yudhishthira with gifts of various kinds of precious stones.॥ 28॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas