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mahabharat 2.55.27: वसुदेव श्रीकृष्ण द्वारा किए गए महान् अधर्म का उत्तर महान् पाण्डवों के प्रताप से हुआ ॥27॥   |   mahabharat अध्याय 2.55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 55: दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.55.27 
वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्तं महत् कृतम्।
सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव श्रीकृष्ण द्वारा किए गए महान् अधर्म का उत्तर महान् पाण्डवों के प्रताप से हुआ ॥27॥
 
The great wrong deed done by Vasudev Shri Krishna was succeeded by the greatness of the great Pandavas. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)