Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 2.54.29: हे पुरुष रत्नों! शत्रुता और विरोध से दूर रहकर तथा सबका प्रिय बनकर मैं इस संसार में निन्दा का पात्र नहीं बन सकूँगा।   |   mahabharat अध्याय 2.54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.54.29 
विग्रहं दूरतो रक्षन् प्रियाण्येव समाचरन्।
वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभा:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुष रत्नों! शत्रुता और विरोध से दूर रहकर तथा सबका प्रिय बनकर मैं इस संसार में निन्दा का पात्र नहीं बन सकूँगा।
 
'O gems of men! By keeping away from enmity and opposition and being dear to all, I will not be able to be condemned in this world.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)