श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.54.27 
न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातॄनन्यांश्च पार्थिवान्।
स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत् समुदाहरन्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने भाइयों और अन्य राजाओं से कभी कटु वचन नहीं बोलूँगा। मैं अपने सम्बन्धियों की आज्ञा का पालन करूँगा और जो कुछ वे माँगेंगे, उसे लाने में प्रसन्नतापूर्वक लगा रहूँगा।॥27॥
 
‘I will never speak harsh words to my brothers and other kings. I will obey my relatives and will happily keep myself busy in bringing them whatever they ask for.’॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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