श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 54: व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.54.24 
मा राजन् कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम्।
सम्प्रधार्य महाराज यत् क्षेमं तत् समाचर॥ २४॥
 
 
अनुवाद
‘राजन्! इस भयंकर मोह में मत पड़ो, यह बुद्धि का नाश करने वाला है। महाराज! अच्छा विचार करो और जो हितकर समझो, वही करो।’॥24॥
 
‘King! Do not fall into this dreadful temptation, it destroys the intellect. Maharaj! Think well and do whatever you think is beneficial.’॥ 24॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas