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श्लोक 2.54.24  |
मा राजन् कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम्।
सम्प्रधार्य महाराज यत् क्षेमं तत् समाचर॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| ‘राजन्! इस भयंकर मोह में मत पड़ो, यह बुद्धि का नाश करने वाला है। महाराज! अच्छा विचार करो और जो हितकर समझो, वही करो।’॥24॥ |
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| ‘King! Do not fall into this dreadful temptation, it destroys the intellect. Maharaj! Think well and do whatever you think is beneficial.’॥ 24॥ |
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